क्या है मुहर्रम क्यों मनाया जाता है, जानने के लिए देखें यह रिपोर्ट

झुकता नहीं है हक कभी बातिल के सामने, हर जुल्म के खिलाफ हिदायत हुसैन है

 

गोंडा: जंगे कर्बला में हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 जानिसार साथियों की शहादत के गम में अपने-अपने तरह से सभी समुदायों के लोग मोहर्रम के त्योहार को मनाते हैं जुल्म और बातिल के खिलाफ जंग में हजरत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ मैदान ए कर्बला में शहीद हो गए थे l 10वीं मुहर्रम जिसको योमें आशूरा के नाम से भी जानते हैं के दिन हजरत इमाम हुसैन शहीद हुए थे इसीलिए उन्हें अकीदतमंद दसवीं मुहर्रम को अपने ताजियों और आजदारों को कर्बला में ले जाकर ठंडा करते हैं

क्या है मुहर्रम क्यों मनाया जाता है

इंसानियत और इस्लाम को बचाने के लिए नबी-ए-करीम के नवासे हजरत इमाम-ए-हुसैन ने अपने कुनबे के लोगों और 72 साथियों की कुर्बानी कर्बला के मैदान में दी थी। तब से इस्लाम अनुयायियों के लिए मुहर्रम की अहमियत सबसे अलग है।

 

हजरत इमाम-ए-हुसैन का काफिला 61 हिजरी (680 ई०) कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान में पहुंचा। इस काफिले के हर शख्स को पता था कि इस रेगिस्तान में भी उन्हें चैन (सुकून) नहीं मिलने वाला और आने वाले दिनों में उन्हें और अधिक परेशानियां वरदाश्त करना होगा। बावजूद इसके सबके इरादे मजबूत थे। अमन और इंसानियत के ‘मसीहा’ का यह काफिला जिस वक्त धीरे-धीरे कर्बला के लिए बढ़ रहा था, रास्ते में पड़ने वाले हर शहर और कूचे में जुल्म और प्यार के फर्क को दुनिया को बताते चल रहा था।

बेहद जालिम बादशाह था यजीद

उस दौर में यजीद जो एक जालिम हुक्मराह था। वह बजाहिर मुसलमान लेकिन हकीकत में इस्लामी पसंदी का तालीमात का मुखालिफ था। वह दारु शराब और बेहयाई को आम करना चाहता था अपने जुल्म और ज्यादती के बदौलत शाम(सीरिया) का हाकिम बन बैठा था। वह इमाम-ए-हुसैन को अपना दुश्मन समझता था और इस्लाम को अपनी हुकूम के लिए सबसे बड़ा खतरा समझ रहा था

किरदार-ए-वफा थे हुसैन

हजरत इमाम-ए-हुसैन अपने इल्म, एखलाक और किरदार की वजह से अपने वालिद हजरत मौला अली और नाना नबी-ए-करीम की तरह मकबूल थे। इस बीच यजीद की साजिशें बढ़ने लगी l हजरत इमाम-ए-हुसैन को कूफा वालो ने खत देखकर बुलाया कि आपको खाने आए और यजीद के विरुद्ध लड़ाई में हम आपका साथ देंगे लेकिन इमामे हुसैन के कूफा पहुंचने पर कूफा वालो ने धोखा दिया । इमाम से लोगों के प्यार की सबसे बड़ी वजह यह थी कि वो इस्लाम के आखिरी पैगम्बर के नवासे थे और मिटती हुई इंसानियत को बचाने के लिए जुल्म के खिलाफ निकले थे।

मुहर्रम का चांद देखते ही कलेजा थर्रा जाता है

आज भी मुहर्रम के चांद पर नजर पड़ते ही इंसानियत का कलेजा कांप उठता है। इसकी वजह यह है कि इस चांद की दस तारीख को पैगम्बर-ए-इस्लाम की इकलौती बेटी हजरत-ए- वीबी फात्मा के आंखों के तारे इमाम-ए-हुसैन को दहशतगर्दों ने बेरहमी के साथ तीन दिन के भूखे-प्यासे को कर्बला की तपती हुई रेगिस्तान में शहीद कर दिया था। दहशतगर्दों ने इमाम को यह सोंचकर शहीद किया था कि इंसानियत को दुनिया से मिटा दूंगा, लेकिन वह भूल गया कि वह जिसका खून बहा रहे हैं वह नवासे रसूल का हैं। जो इस अजम के साथ घर से बाहर आया है, वह हक और बातिल के फर्क को दुनिया से मिटा देंगें।

जब हुसैन ने छोड़ा मदीना

इमाम-ए-हुसैन ने अपने नाना का रौजा मां की कब्र भाई हजरत-ए-हसन की कब्र का आखिरी बार जियारत कर मदीना छोड़ दिया था। इमाम मदीने से चले तो पूरा खानदान आपके साथ था, सिर्फ एक बीमार बेटी हजरत-ए- जैनब-ए-सुगरा को नबी-ए-करीम की जौजा हजरत-ए-उम्मे सलमा के पास छोड़ दिया था। 28 रज्जब को मदीने से रवाना हुआ यह काफिला रास्ते की मुसीबतें बर्दाश्त करता हुआ कर्बला पहुंचा। रवायतों में है कि एक जगह पह़ुचकर इमाम के घोड़े ने कदम आगे नहीं बढ़ाया यहां तक कि इमाम ने सात घोड़े बदले लेकिन सभी घोड़ो ने एक भी कदम आगे नही बढ़ाया। तो इमाम ने अपने भाई हजरत-ए-अब्बास से कहा कि यहां कयाम (ठहरा) किया जाये और खेमे लगवा दिए जाएं। फिर मकामी लोगों व इस जमीन के मालिकों को बुलाकर 60 हजार दीनार में यह जमीन खरीदी और इमाम-ए-हुसैन ने कहा कि इस जगह को हम लोग आबाद करेंगे और आज से यह मुकाम कर्बला के नाम से मशहूर होगा।

क्षेत्र का बेजोड़ मेला है सातवीं और दसवीं मोहर्रम का मेला

सातवीं मोहर्रम को विकास खंड बभनजोत के ग्राम पंचायत कस्बा खास में कदमें रसूले पाक पर क्षेत्र नहीं जिलेभर के सभी समुदायों के लोग आते हैं मिठाई चढ़ाते हैं और मन्नतें मांगते हैं और दसवीं मुहर्रम को ग्राम सभा महुआ पाकड़, बकवा दरगाह, में लगने वाला मुहर्रम का मेला बहुत प्रसिद्ध है । यहां दूर-दूर से ताजियादार ताजिया लाकर ठंडा करते हैं

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